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प्रख्यात शिक्षाविद् और समाजसेवी प्रोफेसर रुद्रकांत झा का निधन, शोक की लहर

खबर सारांश

भैरव स्थान थाना क्षेत्र के रैयाम ग्राम सहित संपूर्ण मिथिलांचल के लिए एक युग का अंत हो गया है, जब 24 फरवरी 2026 को अंग्रेजी साहित्य के प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर रुद्रकांत झा का उनके पैतृक निवास पर निधन हो गया। 1 सितंबर 1942 को जन्मे प्रोफेसर झा का […]

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प्रख्यात शिक्षाविद् और समाजसेवी प्रोफेसर रुद्रकांत झा का निधन, शोक की लहर
लगभग 3 मिनट

भैरव स्थान थाना क्षेत्र के रैयाम ग्राम सहित संपूर्ण मिथिलांचल के लिए एक युग का अंत हो गया है, जब 24 फरवरी 2026 को अंग्रेजी साहित्य के प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर रुद्रकांत झा का उनके पैतृक निवास पर निधन हो गया। 1 सितंबर 1942 को जन्मे प्रोफेसर झा का जीवन ज्ञान की साधना और सामाजिक सुधार का एक अद्भुत संगम था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात झंझारपुर के दीप कॉलेज से अपने गौरवशाली शिक्षण करियर की शुरुआत की थी।

इसके उपरांत उन्होंने असम के ऐतिहासिक माजुली द्वीप स्थित माजुली कॉलेज में दशकों तक अपनी सेवाएं दीं, जहाँ उनके पढ़ाने की शैली और अंग्रेजी साहित्य पर उनकी पकड़ ने उन्हें विद्यार्थियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बना दिया। 31 अगस्त 2002 को सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका शिक्षा के प्रति लगाव कम नहीं हुआ और वे निरंतर समाज को नई दिशा देने में लगे रहे।

प्रोफेसर झा केवल एक कुशल शिक्षक ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी समाजसेवी भी थे। महिला शिक्षा के प्रति उनकी संवेदनशीलता का प्रमाण तब मिला जब उन्होंने असम के कमलाबाड़ी में बालिकाओं के लिए विद्यालय की स्थापना हेतु अपनी निजी भूमि सहर्ष दान कर दी। शिक्षा के साथ-साथ उनकी गहरी आध्यात्मिक आस्था भी उनके व्यक्तित्व का मुख्य आधार थी। उन्होंने अपने पैतृक गांव रैयाम में पूर्णा पोखर के तट पर संकट मोचन हनुमान मंदिर का भव्य निर्माण करवाया, जो आज आस्था का प्रमुख केंद्र है।

इसके अतिरिक्त, गांव के विकास में रुचि लेते हुए उन्होंने सार्वजनिक घाटों के निर्माण और शिव मंदिर की स्थापना में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की। उनका जीवन सादगी और उच्च विचारों का जीवंत उदाहरण था, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।

उनके निधन की सूचना मिलते ही क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों, पूर्व शिष्यों और ग्रामीणों का उनके निवास पर तांता लग गया। लोगों ने उन्हें एक ऐसे मनीषी के रूप में याद किया जिन्होंने असम और बिहार के बीच शिक्षा व संस्कृति का एक मजबूत सेतु बनाया था। उनके जाने से शिक्षा जगत और सामाजिक क्षेत्र में एक ऐसी रिक्तता पैदा हो गई है जिसे भरना अत्यंत कठिन है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रोफेसर झा का योगदान केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने कार्यों से हजारों लोगों के जीवन को प्रकाशित किया। इस दुःखद घड़ी में ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति और उनके शोक संतप्त परिवार को यह अपार कष्ट सहने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की जा रही है।

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