47 वर्षों का लंबा इंतज़ार खत्म! 1979 से मान्यता की आस लगाए संस्कृत विद्यालय पर पटना हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश

पटना: पटना उच्च न्यायालय ने मधुबनी जिले के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र बाबूबरही स्थित ‘झोटन अनंत संस्कृत उच्च विद्यालय, नवानगर’ को मान्यता और संबद्धीकरण देने के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति हरीश कुमार की एकल पीठ ने विद्यालय के शिक्षकों एवं कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं को चार सप्ताह के भीतर बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के सचिव के समक्ष नया आवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने बोर्ड प्रशासन को आदेश दिया है कि वह मधुबनी के जिलाधिकारी (DM) से वैधानिक रिपोर्ट प्राप्त कर तीन महीने के भीतर नियमानुसार मान्यता की प्रक्रिया पूरी करे।
1979 से जारी संघर्ष: लालफीताशाही और प्रशासनिक उपेक्षा का दंश
अदालत में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए विद्वान अधिवक्ता ब्रजेश वर्मा ने पीठ को अवगत कराया कि यह संस्थान वर्ष 1979 से ही लगातार राज्य सरकार और बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड से संबद्धीकरण पाने की प्रतीक्षा कर रहा है। वर्ष 1979 में संस्थापक डॉ. राधाकांत मिश्र ने क्षेत्र में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार और ग्रामीण व आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से इस विद्यालय की स्थापना की थी। इसके लिए उन्होंने अपनी 1 बीघा 19 कट्ठा निजी जमीन विद्यालय को दान में दी, जिस पर पक्का भवन निर्मित है और विद्यालय सुचारू रूप से संचालित हो रहा है। परंतु, बीते 47 वर्षों से मान्यता न मिलने के कारण यहाँ कार्यरत शिक्षकों, कर्मचारियों और अध्ययनरत छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है तथा संस्थान गंभीर वित्तीय एवं प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है।
कागज़ों में सिमटी प्रक्रिया: भौतिक निरीक्षण के बाद भी अटकी रही फाइल
सुनवाई के दौरान न्यायालय के संज्ञान में लाया गया कि विद्यालय प्रबंधन द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए वर्ष 2014 से पूर्व से ही लगातार प्रयास किए जाते रहे थे। अंततः सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ वर्ष 2014 में जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO), मधुबनी के समक्ष औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया गया। इसके बाद, सर्व शिक्षा अभियान के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी ने भौतिक निरीक्षण कर रिपोर्ट सौंपी थी कि विद्यालय मान्यता की सभी शर्तों को पूरा करता है। इस रिपोर्ट के आधार पर माध्यमिक शिक्षा विभाग के विशेष निदेशक ने 1 अप्रैल 2016 को पत्र संख्या 349 के जरिए संस्कृत शिक्षा बोर्ड को नियमानुसार मान्यता की कार्रवाई करने का स्पष्ट निर्देश दिया था, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और बोर्ड की सुस्ती के कारण मामला वर्षों तक फाइलों में दबा रहा।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख: 3 महीने के भीतर फैसला लेने की तय की समय-सीमा
राज्य सरकार और बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि ‘बिहार गैर-सरकारी संस्कृत विद्यालय (मान्यता की शर्तें) नियमावली, 1993’ के नियम 5 के तहत जिलाधिकारी की अनुशंसा या आधिकारिक रिपोर्ट अनिवार्य होती है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि नियमावली के तहत डीएम की रिपोर्ट जरूरी है। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता 4 सप्ताह के भीतर बोर्ड के सचिव के समक्ष नया आवेदन जमा करेंगे। आवेदन मिलते ही बोर्ड के सचिव अविलंब जिलाधिकारी (मधुबनी) से रिपोर्ट तलब करेंगे और रिपोर्ट प्राप्त होने के 3 महीने के भीतर कानून एवं लागू नियमों के अनुसार मान्यता पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। उच्च न्यायालय के इस कड़े आदेश से बीते 47 सालों से हक की लड़ाई लड़ रहे विद्यालय परिवार, शिक्षकों, कर्मचारियों और स्थानीय ग्रामीणों में उम्मीद की नई किरण जगी है।
Reporter से सवाल पूछें
सवाल भेजने के लिए login करें।




झंझारपुर इंद्र पूजा मेला
झंझारपुर होकर चलने वाली जोगबनी दानापुर इंटरसिटी एक्सप्रेस 13211/ 12 में जनरल कोच बढ़ाने की आवश्यकता है। कृपया इस…
अपनी प्रतिक्रिया दें